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काव्य की रीति सिखी सुखबीन सों : रीतिकाल में फ़ूको विचरण (3)

पचौरी, सुधीश

FormatEbook
Published2016
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy $1
About this book
2001 में सुधीश पचौरी ने 'रीतिकाल में फूको-विचरण' शीर्षक से एक अध्ययन शृंखला शुरू की थी। यह लेख उस शृंखला की तीसरी किश्त है, जिसमें लेखक ने रीतिकाल के आचार्य-कवियों द्वारा निभाई जाने वाली काव्य-शिक्षण की पेशेवर भूमिका के साथ-साथ तत्कालीन सांस्कृतिक बाज़ार में कविता की माँग और आपूर्ति के समीकरण को विशेष रूप से रेखांकित किया है। हिन्दी साहित्य के इतिहास की विभिन्न रचनाओं को पढ़कर इस लेख में विक्टोरियायी सेक्शुअल नैतिकता, ब्राह्मणवादी ब्रह्मचर्य, उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद, ब्रज की जगह हिन्दी लाने के राष्ट्रवादी उद्यम और प्रोटेस्टेंटिज़म के भारतीय रूप आर्य समाज के सांस्कृतिक गठजोड़ के फलितार्थों पर भी प्रकाश डाला गया है।

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