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डर की गिरफ़्त में हम कहाँ
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About this book
यह कैसे हुआ कि चिन्ताएँ और डर हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए। इनके पीछे मीडिया की भूमिका को चिह्नित करते हुए लेखक पाता है कि टेलीविज़न और अख़बार से लेकर इंटरनेट तक हर जगह समस्याओं और ख़तरों की ही चर्चा है। ग़रीब अपनी सामाजिक हैसियत के कारण परेशान है तो मध्यवर्ग ज्ञान जनित चिन्ताओं में उलझा है। समाज का हर तबक़ा अपनी वर्गीय स्थितियों के अनुरूप ही डरा हुआ और चिन्ताग्रस्त है। एक ओर मीडिया डर फैलाकर लाभान्वित हो रहा है तो दूसरी ओर ऐसे व्यापार हैं जो चिन्ताग्रस्त लोगों से लाभान्वित होते हैं।