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उत्तर प्रदेश में भी एक बड़ा जनजातीय समाज है
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इस लेख में उत्तर प्रदेश के जनजातीय लोगों की पीड़ा और उन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता न देने के ऐतिहासिक दोष की पड़ताल की गई है। यूपी में जनजातियों की पर्याप्त आबादी है, जिन्हें अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक और प्रशासनिक श्रेणी से बहिष्कृत करके ग़लत तरीक़े से हिन्दू सामाजिक पदानुक्रम की निम्न/निम्नतम श्रेणियों में रख दिया गया। लेखक समुचित आँकड़ों एवं तथ्यों के द्वारा अपनी बात सिद्ध करते हुए कहते हैं कि जनजातीय मुद्दों पर फिर से विचार करना ज़रूरी है ताकि उन्हें पहचान, समावेशन, सामाजिक-आर्थिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारिता में अपना हक़ मिल सके।