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लिखने और पढ़ने का सम्बन्ध
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About this book
सिर्फ़ किताबें पढ़ना ही पढ़ना होता है? क्या कोई लेखन पूर्णतः काल्पनिक और समाजनिरपेक्ष हो सकता है? क्या केवल लिखना ही लेखक का कर्तव्य है? इस तरह के सवालों को उठाते हुए लेखिका ने इनके माक़ूल जवाब इस लेख में दिए हैं। लेख जनप्रतिबद्धता, पाठक के प्रति दायित्वों और अभिव्यक्ति के ख़तरों भी पढ़ने और लिखने के दायरे में समेटते हुए पढ़ने को सामाजिक दायित्व और लेखकीय कार्य के भीतर समेटता है।