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पाणिनी : भाषा का संसार और संसार में भाषा

काबरा, कमल नयन

FormatEbook
Published2015
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
भारत में भाषाविषयक विमर्श की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। यह लेख इस भाषा-चिन्तन के इतिहास का आलोचनात्मक नज़रिए से विश्लेषण करता है। लेख में भाषा विमर्श के परिपक्व धागे पाणिनि और उनके व्याख्याकारों को माध्यम बनाकर उसके सैद्धान्तिकरण और सम्भावित व्यावहारिक उपयोग को प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने यहाँ उन सभी व्याकरणाचार्यों और भाषाशास्त्रियों की मुख्य स्थापनाओं को यहाँ समेटने का प्रयास किया है, जिनकी मान्यताएँ आज भी भाषा चिन्तन में प्रासंगिक हैं। इसके लिए लेखक ने भाषा के व्यावहारिक पक्ष और सैद्धान्तिक पक्ष, दोनों के इतिहास को पेश करने की कोशिश की।

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