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Cover of क्या अनुवाद की कोई भारतीय पद्धति भी थी?

क्या अनुवाद की कोई भारतीय पद्धति भी थी?

राजकुमार,

FormatEbook
Published2014
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
इस आलेख में अनुवाद को लेकर पाश्‍चात्य व भारतीय दृष्टि की मौलिक भिन्‍नता के बारे में चर्चा है। चूँकि भारत में रचना केवल पाठ नहीं बल्कि पारायण के लिए होती थी इसलिए कथ्य तरल व गतिशील होता था। लेख में भारतीय मानस और अनुवाद की यूरोपीय दृष्टि की तुलना करते हुए एक भाषा से दूसरे में जाते समय कथ्य के आत्मसातीकरण के माध्यम से नई रचना बनने की प्रक्रिया में फ़र्क़ को साफ़ किया गया है। यहाँ अनुवाद के पश्‍चिमी अवधारणा से बिल्कुल भिन्‍न भारतीय पैराडाइग्मेटिक को गहराई से समझाया गया है। बहुभाषी समाज में साहित्य की व्याप्ति, शिक्षा के प्रसार के रोक में लोक साहित्य का भाषायी संसार और सामन्तवादी मानसिकता में अनुवाद की भूमिका पर लेख साफ़गोई से बात करता है।

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