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नारीवाद के बिना सामाजिक विमर्श की सार्थकता

खेतान, प्रभा

FormatEbook
Published2004
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
नारीवाद को परिभाषित करने का प्रयास करता हुआ यह लेख क्या नारीवाद एक आयातित विचारधारा है; क्या पुरुष भी नारीवादी हो सकते हैं जैसे बुनियादी सवालों से टकराता है। नैतिकता, धर्म और परम्परा के नाम पर भारत में पितृसत्ता ने स्त्री मुक्ति आन्दोलन में भी अपनी पैठ बनाई है। धर्म, जाति, संस्कृति और राष्ट्र को नारीवाद के लिए विभेदकारी सीमाएं बताते हुए यह लेख वैश्‍विक बहनापे की ज़रूरत को रेखांकित करता है।

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