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प्रिंसिपल साहब का होना

ठाकुर, मणीष कुमार

FormatEbook
Published2020
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
स्वातंत्र्योत्तर भारत में 1960, 1970 और 1980 के दशकों में छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में शैक्षिक संस्थाओं का ऊर्ध्वगामी और क्षैतिज विस्तार हुआ। शैक्षिक संस्थाओं का यह विस्तार सिर्फ़ राज्य की योजनाओं के अन्तर्गत नहीं हुआ, ज़्यादातर ये संस्थान जन सहयोग से स्थापित हुए। ये संस्थान स्थानीय चेतना के उदात्त और तुच्छ पहलुओं को एक साथ उजागर करते हैं। ऐसे ही एक संस्थान को नेतृत्व देने वाले प्रधानाचार्य के व्यक्तित्व को यह संस्मरणात्मक लेख सामने लाता है। लेख एक ख़ास परिवेश में विकसित हुई इंस्टीटूशनल लीडरशिप की रूपरेखा को उसकी तमाम जटिलताओं के साथ उकेरने की कोशिश करता है।

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