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एक नये विश्‍व की ओर

शाही, विनोद

FormatEbook
Published2001
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
लेख वैश्‍विक स्तर पर होने वाले व्यवस्थागत बदलावों और जन-आन्दोलनों में जनक्रान्ति की सम्भावनाएं देखते हैं। व्यक्ति चेतना और समाज-तंत्र के आपसी रिश्ते को समाज व्यवस्थाओं के बनने-बिगड़ने से जोड़ते हुए लेख परस्पर सहभागिता को दोनों के सकारात्मक विकास के लिए ज़रुरी मानते हैं। लेखक बताता है कि किसी भी प्रगतिशील तंत्र के निर्माण के लिए अनवरत क्रान्ति की आवश्यकता होती है और इससे चूकना प्रतिक्रान्ति को जन्म देता है।

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