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बेज़ुबानी ज़ुबान हो जाए…

यादव, राजेन्द्र

FormatEbook
Published2005
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
लेख स्त्रियों की स्थिति की विस्तारपूर्वक इसकी चर्चा करता है। लेख यह समझाने का प्रयास करता है कि उनके दुखों के लिए समाज उन्हें बदनाम करता है और वे किस प्रकार इन दुखों से लड़ती हैं, प्रेम उनकी ज़िन्दगी में क्या भूमिका निभाता है, उनकी ज़िन्दगी उनके लेखन को किस प्रकार पुरुषों के लेखन से अलग करती है। अपनी इस चर्चा के ज़रिये लेखक स्त्री और दलित विमर्श जैसे मुक्तिकामी विमर्शों के महत्व और उनकी अपरिहार्यता को रेखांकित करता है।

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