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भारतीय लोकतंत्र : बढ़ते क़दम

लोढ़ा, संजय

FormatEbook
Published2008
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
आर्थिक संकट से जूझते, विविधताओं से भरे भारतीय लोकतंत्र को यह लेख पश्‍चिमी लोकतंत्र से मूलतः भिन्‍न मानता है। भारत के लिए लोकतंत्र को अनुपयुक्त मानने वाले आलोचकों की चर्चा करते हुए लेखक बताता है कि वे आलोचक ग़लत साबित हुए और भारत ने अपने समाज के अनुसार लोकतंत्र को गढ़ा है। लेखक का विश्‍वास है कि अपनी विशेषताओं के चलते यहाँ लोकतंत्र का पश्‍चिमी मॉडल कारगर नहीं है और भारतीय लोकतंत्र दूसरे समाजों को भी दिशा देगा।

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