Home › Literature › गाती-झूमती मज़े लेती वैकल्पिक आधुनिकता : हबीब तनवीर का रंगकर्म
गाती-झूमती मज़े लेती वैकल्पिक आधुनिकता : हबीब तनवीर का रंगकर्म
Full text being prepared
Keep a copy ₹9
About this book
उपनिवेशित देशों के बुद्धिजीवियों और कला-माध्यमों को पश्चिम से बहुत अधिक टकराना पड़ा है। भारत में महात्मा गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि का चिन्तन इसी टकराहट में विकसित हुआ। हबीब तनवीर के रंगकर्म का भी विकास ऐसा ही है। वे पश्चिम से प्रशिक्षण लेकर आते हैं, लेकिन अपना रंगकर्म अपनी जमीन में विकसित करते हैं। उनके रंगकर्म को कई बार लोकशैली या पारम्परिक रंगकर्म कह दिया जाता है। हबीब इसका प्रतिवाद करते हैं कि वे आधुनिक रंगकर्म का ही प्रयोग कर रहे हैं। इस लेख में हबीब तनवीर के रंगकर्म की इस आधुनिकता की पड़ताल की गई है।