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राह ‘प्रजातंत्र’ से जनतंत्र की
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लेख बताता है कि जनतंत्र निर्माण के लिए राज्य द्वारा भौतिक संसाधनों का सार्वभौमिकीकरण किया जाना चाहिए। किन्तु इसके उलट राज्य भौतिक संसाधनों पर ख़ुद ही कब्ज़ा कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि भौतिक संसाधनों से वंचित जनता के लिए सामुदायिक पहचान ही प्रमुख बन जाती है। इसे बचाए रखने के लिए व्यक्ति और विशेषकर महिलाओं की स्वतंत्र गतिशीलता पर अंकुश लगाया जाता है। यह प्रक्रिया जाति और कर्मकाण्डों के रूप में अन्ततः सामाजिक भेदभाव को ही बढ़ावा देती है। इसलिए एक सफल जनतंत्र के लिए राज्य को जनसहभागिता की पहल करनी चाहिए।
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