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ज्ञान की सामाजिक उपयोगिता और 'मुर्दहिया'

ठाकुर, मणींद्र नाथ

FormatEbook
Published2013
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
इस लेख में समाजशास्त्र के स्वरुप पर विद्वानों के बीच जारी बहस पर चर्चा की गयी है। लेखक का कहना है कि इस बहस को समझने के लिए तुलसी राम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ एक उपयोगी माध्यम हो सकती है। दलितों के भोगे हुए शोषण और अपमान से जो आन्तरिक मनोभाव उत्पन्‍न होते हैं, उसकी सूक्ष्मता को गैर-दलितों द्वारा समझे जाने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। ‘मुर्दहिया’ ने इस आयाम को जिस तरह से उजागर किया है, उसके सहारे दलित समाज में इस प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है, जिससे समाजशास्त्र के स्रोतों, उपागमों और विषय-वस्तुओं में ज़्यादा खुलापन आ सकता है।

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