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आने वाले कल की यादें : बच्चे, श्रम और औपचारिक स्कूली शिक्षा की रामबाण औषधि

बालगोपालन, शारदा

FormatEbook
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
यह लेख बालश्रम के ख़ात्मे हेतु औपचारिक स्कूली शिक्षा के रामबाण उपाय की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। यह बताता है कि दो विचारधाराओं— पाश्‍चात्य बुर्जुआ बचपन और विविध बचपन —में से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास पहली पर आधारित हैं। यह इस बाइनरी में तीन प्रमुख निर्माणों पर चर्चा करता है— बच्चा, स्कूल और श्रम। दो उत्तर भारतीय राज्यों में दलित और आदिवासी बच्चों के स्कूली शिक्षा अनुभवों तथा बांग्लादेश एवं कलकत्ता में बाल मज़दूरों की शिक्षा की पहल का हवाला है। शिक्षा से उनके ऐतिहासिक बहिष्कार को इंगित करते हुए, यह बच्चे को पृथक व्यक्तिगत इकाई मानने के प्रति सावधान करता है।

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