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दलित संचेतना के उभरते प्रश्‍न

शलभ’, धर्मपाल गुप्त

FormatEbook
Published2001
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
हिंदी साहित्य में आपना स्थान पाने के लिए दलित लेखन को मशक्‍कतों के कई दौरों से गुज़रना पड़ा, जो आज भी बदस्तुर जारी है। उसके उभार ने जो प्रश्‍न खड़े किए और जो चुनौतियां उसके सामने थीं, यह प्रस्तुत लेख उनकी चर्चा करता है। दलित लेखकों और हिन्दी के प्रगतिशील आलोचकों के वैचारिक अलगाव और विरोध का लेख ज़िक्र करता है। इस समस्या की ओर भी लेख ध्यान देता है कि मनुवाद विरोधी जो चेतना दलित लेखन में दिख रही है, वह उतने ही शिद्दत के साथ दलित संगठनों और नेताओं में नहीं दिखती।

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