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मैं नास्तिक क्यों हूँ

सिंह, भगत

FormatEbook
Published1932
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy $1
About this book
यह ऐतिहासिक लेख धर्म एवं दर्शन की भाग्यवाद, ईश्वर, कर्म-फल, पुनर्जन्म, परलोकवादी दर्शन के सामने ‘तार्किक’ चुनौतियाँ पेश करता है। धर्म विशेष के उदाहरणों से बचते हुए लेखक ने धर्म की संकल्पना और उसकी ज़रूरत को न सिर्फ़ सिरे से ख़ारिज किया है, बल्कि उसके पीछे छिपी शोषकों की राजनीति और मानसिकता को भी उजागर किया है। लेख न केवल वैचारिक इतिहास और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है, बल्कि इसमें राष्ट्र एवं अधिक मानवतावादी समाज संकल्पना को भी पेश किया गया है।

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