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भारतीय भाषाएँ : विकासशील समाज में पहचान का माध्यम

Unknown author

FormatEbook
Published2020
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
यह लेख भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में पहचान और अस्मिता पर कुछ बातें करता है। हर समुदाय अपनी भाषा को सजीव रखने का प्रयास करता है हालाँकि राष्ट्रीयता की बहस व विकास के दबाव के चलते यह मुश्किल हो जाता है व कम सदस्यों वाले भाषा समूह भी छोटे होते जाते हैं। भाषा के प्रति लगाव जकड़न के रूप में भी हो सकती है व खुले उदार स्वरूप में भी। लेख भारतीय भाषा परिवारों से परिचित करवाता है व भाषा के पहचान से रिश्ते व उससे उत्पन्न संघर्षों व अलगावों को भी उभारता है।

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