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भारत में धार्मिक पहचानों का गठन

श्रीमाली, कृष्ण मोहन

FormatEbook
Published2017
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
भारतीय मिथकों में 'विचारों' तथा 'दैवीयता' का परिचय डार्विन की इस धारणा को सही साबित करता है कि दुनिया में सबसे सबल ही जीवित रह पाता है। कुछ समय से धर्माधारित राष्ट्र की माँगे कुलाँचे मार रही हैं, वह भी आधुनिक और उत्तर-आधुनिक समय में! विभिन्‍न पहचानों को किसी एक ख़ास पहचान के छाते के नीचे एक ही मान कर चलने के लिए लोगों को मानसिक रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है। लेख ज़ोर देकर कहता है कि इसे अन्तर्वेशन न मानते हुए कई समुदायों का बहिर्वेशन माना जाए और इस एकता को सत्ता पाने के लिए की जा रही कवायद के रूप में देखना लाज़मी है। इस सारी प्रक्रिया को लेख कई कोणों से प्रस्तुत करता है।

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