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लोकप्रिय का अनुकूलन और लोक का विस्थापन : आधुनिक हिन्दी रंगमंच का उदय
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About this book
यह आलेख औपनिवेशिक काल में अँग्रेज़ी व यूरोपीय साहित्य के भारतीय रंगमंच पर हुए प्रभावों को प्रस्तुत करता है। लेखक ने दिखाया है कि किस तरह भारतीय रंगमंच एक लोकमाध्यम से अभिजन व औपनिवेशिक सत्ता का हथियार बनता गया। सत्ता केन्द्र में मध्यवर्ग के आने व उसके चरित्र की वजह से पारम्परिक रंगमंच के प्रति हीन भावना पैदा हुई। इसके साथ ही आदर्श के रूप में यूरोपीय व संस्कृत रंगमंच की ओर देखने से रंगमंच से सामान्य जन और उनकी दृष्टि को बाहर कर दिया गया। इससे न सिर्फ़ रंगमंच का कथ्य बदला, बल्कि उसकी संरचना और चरित्र में भी बदलाव आए। इस लेख में रंगमंच पर यर्थाथवादी रंगमंच, पारसी रंगमंच व्यावसायिकता, राष्ट्रीय आन्दोलन, हिन्दी प्रचार, समाज सुधार आन्दोलन के प्रभाव का आकलन है।