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व्यक्तिपूजा और व्यवस्था के ख़तरे
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About this book
व्यक्तिपूजा को बहुप्रचलित और अनावश्यक बताते हुए लेख उसके ख़तरों और दुरुपयोगों पर बात करता है। संस्थानों को व्यक्ति केन्द्रित नाम देना और स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रसिद्ध नामों के प्रयोग को लेखक आम होती राजनीतिक समस्या के रूप में देखता है। वह इसे राजनीति में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली और समाज में सामूहिक योगदान का महत्व घटाने वाली समस्या मानता है। लेख व्यक्तिपूजा के समाजशास्त्रीय और मानसशास्त्रीय पहलूओं पर भी प्रकाश डालता है।