HomeScience › सवाल व्यवस्था का नहीं, सम्पूर्ण व्यवस्था का है

Cover of सवाल व्यवस्था का नहीं, सम्पूर्ण व्यवस्था का है

सवाल व्यवस्था का नहीं, सम्पूर्ण व्यवस्था का है

दोषी, शम्भूलाल

FormatEbook
Published1981
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
भारतीय जनमानस राजनीति को समाज में विद्यमान सभी सन्दर्भों का केन्द्र मानते हुए सामाजिक जीवन की सरलता और उपयोगिता के लिए राजनीतिक व्यवस्थाओं को सुचारु और सुदृढ़ करने पर बल देता है। लेख मानव जीवन में राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना में सामाजिक व्यवस्था की आधारभूत उपादेयता प्रस्तुत करते हुए बताता है कि समाज व्यवस्था के मूल्यों और मानकों के सही क्रियान्वयन पर समाज से जुड़ी अन्य व्यवस्थाएँ स्वतः उपयोगी होंगी। लेख अगली पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनाने के नज़रिए से भारत और अमेरिका की सामाजिक संरचनाओं की तुलना पेश करता है।

More in Science

Browse all →