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सामाजिक न्याय की अवधारणा और स्वरूप

विद्यालंकार, धर्मचन्द्र

FormatEbook
Published2001
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy $1
About this book
लेख सामाजिक न्याय के एक अंग के तौर पर दलितों और पिछड़ों को दिए जाने वाले आरक्षण का औचित्य समझाने का प्रयास करता है। कुछ उदाहरणों से लेखक बताता है कि पारम्पपारिक तौर पर जिन जातियों का तमाम साधनों पर कब्ज़ा रहा है, वे आज भी सभी क्षेत्रों में आगे हैं। इस गैर-बराबरी को दूर करने के लिए वंचित तबकों को आरक्षण क्यों दिया गया है? क्या इसका मक़सद सिर्फ़ आर्थिक विकास या भौतिक विकास है या फिर यह सारे समाज की मानसकिता को आगे ले जाने का एक मार्ग बन सकता है?

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