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संवाद : क्या सामाजिक अध्ययन सिर्फ रटने का विषय है
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क्या सामाजिक अध्ययन सिर्फ रटने का विषय है? इस पर हुए संवाद में यह कुछ मुद्दे उभर कर आए कि सामाजिक अध्ययन के बारे में यह एक आमधारणा है कि उसमें समझने-समझाने से ज़्यादा याद करने का मसला है, इसे कोई भी शिक्षक पढ़ा सकता है, यह स्कोरिंग विषय है, लड़कियाँ ही इसे ज़्यादा चुनती हैं आदि। दरअसल परीक्षा केन्द्रित व्यवस्था के चलते ये सब धारणाएँ बनी हुई हैं, जिन्हें तोड़ने की ज़रूरत है।
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