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जाति के बारे में बच्चों का नज़रिया
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इस लेख में 12 से 15 वर्ष के बच्चों से जाति के मुद्दे पर हुई बातचीत को प्रस्तुत किया गया है। इस बातचीत के आधार पर लेखक बताते हैं कि शिक्षा द्वारा जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने वाले विभिन्न व्यवहार और समझ कैसे पुनरुत्पादित होती जाती है। वे बताते हैं कि वयस्क और शिक्षक इन बातों को जाने-अनजाने पोषित ही करते हैं, और यह भी कि स्कूल का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि वे शिक्षा को समावेशी बनाएँ और विद्यार्थियों को चिन्तनशील व तार्किक, लेकिन स्कूल ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं।
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