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राहे मंजिल की बाकी हैं दुश्वारियाँ

सहाय, निरंजन

FormatEbook
Published2011
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
यह लेख आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर वर्चस्वशाली तबकों के वर्चस्व की परिघटना की पड़ताल करता है। लेख बताता है कि भारतीय राज्य लोकतंत्र बनने के लिए प्रयासरत है; अभी सार्वजनिक व्यवस्थाएँ लोकतांत्रिक नहीं हुई हैं; और शिक्षा मध्यवर्गीय जकड़ से बाहर नहीं आई है। लेख सुझाता है कि भारतीय राज्य को ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ स्थापित करनी होंगी जो सभी के लिए समान गुणवत्ता वाली शिक्षा की आकांक्षा को पूरी कर सकें।

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