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ज्ञान की संरचना

अग्निहोत्री, रमा कान्त

FormatEbook
Published2009
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
लेख रेखांकित करता है कि हर बच्चे में भाषा सीखने की जन्मजात क्षमता होती है, वह अपने आस-पास के पर्यावरण से निरन्तर सार्थक संवाद करते हुए अपने ज्ञान की संरचना स्वयं करता है। यह बताता है कि अधिकतर ज्ञान तो पर्यावरण, समाज व दिमाग़ के आपसी क्रियाकलाप व तालमेल से ही बनता है। लेखक 16 महीने के एक बालक के उदाहरण से बच्चों द्वारा पर्यावरण एवं समाज से अन्तर्क्रिया करके अपने दिमाग़ में अवधारणाओं का ख़ाका बनाने की प्रक्रिया को बेहद स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करते हैं। साथ ही वे शिक्षकों से बच्चों के निर्बाध सीखने को प्रेरित करने के लिए सहज वातावरण उपलब्ध करवाने का आग्रह करते हैं।

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