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कुछ पिटे हुए अनुभव

जोशी, सुशील

FormatEbook
Published2021
LanguageHindi
ReadingIncluded
Full text being prepared Keep a copy ₹9
About this book
स्कूलों में शारीरिक दण्ड और अपमान एक नियमित मामले की तरह सामने आता है। बच्चे न केवल अपनी कोमल पीठ पर पाठ्य-पुस्तकों और नोटबुक्स का भार ढोते हैं, बल्कि मूर्खतापूर्ण कारणों के लिए बेंत का खामियाज़ा भी भुगतते हैं जैसे जूते का मेल नहीं खाना या फ़ीता बँधा नहीं होना। बच्चा आस-पास की घटनाओं को देखता है, सोचता है और उसकी नक़ल करता है या प्रतिक्रिया करता है। बच्चे यह मानने लग सकते हैं कि हिंसा करना अच्छा है। आज भी तमाम नियम-कानूनों के बावजूद भारत समेत कई देशों में अनुशासन के नाम पर पिटाई, स्कूली शिक्षा का अभिन्न हिस्सा है। प्रत्येक शिक्षक को लगता है कि उसे बच्चे को अनुशासित करने का पूरा अधिकार है। क्या इस हिंसा के पीछे सामाजिक या भावनात्मक कारण व ग्रन्थियाँ हैं? इस महत्त्वपूर्ण लेख में लेखक के अपने और अपने दोस्तों के इन्हीं मुद्दों पर अनुभव हैंं जो आजीवन मस्तिष्क पर छाप छोड़े हुए हैं।

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