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पटरी से उतरी हुई औरतों का यूटोपिया : राष्ट्रवाद का प्रति-आख्यान
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About this book
यह लेख अनामिका के उपन्यासों की उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शों के आलोक में गहराई से पड़ताल करता है। लेखक ने इस लेख के माध्यम से उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत के उदीयमान भारतीय राष्ट्रवाद और स्त्री-संसार के बीच चल रही जद्दोजहद और बेचैनी को रेखांकित करते हुए उपन्यास विधा, स्त्री जीवन और राष्ट्रवाद के बीच आवाजाही करने वाले तर्कों की पडताल की है। राष्ट्रवाद को आकार देनेवाले मर्दों ने साधारण तौर पर मध्यकालीन स्त्रियों को अपने आदर्श-निर्माण के लिए प्रयुक्त करते हुए इसके बाहर की स्त्रियों को आदर्श-गृहिणी के पद से बाहर रखा और उन्हें 'पटरी से उतरी' औरतों के रूप में चिह्नित किया। यह लेख इसी पुरुषवादी मानसिकता पर पड़ी परतों को आलोचनात्मक नज़रिए खोलता है।
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